भागलपुर/सुल्तानगंज। बिहार के भागलपुर जिले का सुल्तानगंज स्थित अजगैवीनाथ धाम भगवान शिव की उपासना और कांवर यात्रा की परंपरा से विशेष रूप से जुड़ा धार्मिक स्थल है। यहां उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर की ओर रवाना होते हैं। लेकिन इस धाम से जुड़ी एक ऐसी परंपरा भी है, जो श्रद्धालुओं के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय रही है—अजगैवीनाथ धाम के महंत स्वयं देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर में प्रवेश नहीं करते।
इस परंपरा के पीछे स्थानीय धार्मिक मान्यता और महंतों से जुड़ी एक प्रचलित कथा बताई जाती है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में मंदिर के महंतों के हवाले से इस परंपरा का उल्लेख मिलता है।
भगवान शिव से जुड़ी है परंपरा की कथा
अजगैवीनाथ धाम के महंतों के अनुसार, पुराने समय में यहां के महंत नियमित रूप से गंगा स्नान के बाद गंगाजल लेकर देवघर जाते थे और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते थे।
प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक दिन भगवान शिव ने साधु का रूप धारण कर महंत की परीक्षा ली। कथा में बताया जाता है कि उस समय महंत संकल्प लेकर गंगाजल बाबा बैद्यनाथ को चढ़ाने के लिए जा रहे थे। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि उन्हें प्रतिदिन देवघर आने की आवश्यकता नहीं है और अजगैवीनाथ धाम में ही उनकी उपस्थिति मानी जाए।
इसी धार्मिक मान्यता को इस परंपरा का आधार बताया जाता है। इसके बाद से अजगैवीनाथ धाम के महंत स्वयं बाबा बैद्यनाथ मंदिर नहीं जाते और अपनी ओर से प्रतिनिधि को भेजने की परंपरा बताई जाती है।
अजगैवीनाथ धाम में तीन पिंडियों की मान्यता
इस परंपरा का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यहां मौजूद पिंडियों से जुड़ा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने महंतों को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि अजगैवीनाथ धाम में उनकी पिंडी के समीप दोनों महंतों की पिंडियां भी रहेंगी।
इसी वजह से कांवर यात्रा से पहले श्रद्धालुओं द्वारा अजगैवीनाथ धाम में पूजा और जलार्पण करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसके बाद श्रद्धालु गंगाजल लेकर देवघर की यात्रा शुरू करते हैं।
महाशिवरात्रि पर आज भी निभाई जाती है परंपरा
अजगैवीनाथ धाम और बाबा बैद्यनाथ धाम के बीच यह धार्मिक संबंध सिर्फ श्रावणी मेले तक सीमित नहीं है। महाशिवरात्रि के अवसर पर भी अजगैवीनाथ धाम से संकल्प कराकर गंगाजल देवघर भेजे जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
रिपोर्टों के अनुसार, अजगैवीनाथ धाम के स्थानापति महंत से संकल्प कराया जाता है और उसके बाद प्रतिनिधि के माध्यम से गंगाजल बाबा बैद्यनाथ धाम भेजा जाता है। इस जल का उपयोग महाशिवरात्रि से जुड़े अभिषेक और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
अजगैवीनाथ और देवघर का धार्मिक संबंध
सुल्तानगंज की पहचान कांवर यात्रा के प्रमुख पड़ाव के रूप में भी है। उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर श्रद्धालु पैदल देवघर की यात्रा करते हैं। इस यात्रा में अजगैवीनाथ धाम में पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है।
मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि अजगैवीनाथ मंदिर का संबंध लंबे समय से बाबा बैद्यनाथ धाम की पूजा परंपरा से जुड़ा रहा है। हालांकि मंदिर से संबंधित कई बातें धार्मिक मान्यता और स्थानीय परंपरा पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय उसी रूप में प्रस्तुत करना उचित है।
श्रद्धालुओं के लिए क्यों खास है अजगैवीनाथ धाम?
अजगैवीनाथ धाम की खासियत सिर्फ यहां के मंदिर तक सीमित नहीं है। उत्तरवाहिनी गंगा, कांवर यात्रा और बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी धार्मिक परंपराओं ने सुल्तानगंज को शिवभक्तों के लिए महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।
श्रावण के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां गंगा से जल भरते हैं और फिर देवघर की ओर रवाना होते हैं। इसी धार्मिक यात्रा के कारण अजगैवीनाथ धाम की परंपराएं आज भी बिहार और देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले शिवभक्तों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं।
परंपरा आज भी जारी
अजगैवीनाथ धाम के महंतों का देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर में स्वयं प्रवेश न करना एक ऐसी धार्मिक परंपरा है, जिसे स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान शिव से जुड़ी कथा का परिणाम माना जाता है। वहीं महाशिवरात्रि और श्रावण के अवसर पर अजगैवीनाथ से देवघर गंगाजल भेजने की परंपरा इस दोनों धामों के धार्मिक संबंध को दर्शाती है।
