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मुजफ्फरपुर। मुजफ्फरपुर में आयोजित पंडित सहदेव झा स्मृति समारोह में लोक एवं भजन गायिका मैथिली ठाकुर की प्रस्तुति ने लोगों का ध्यान खींचा। उन्होंने पारंपरिक लोकगीत और भजनों की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम को सांस्कृतिक रंग दिया। इस दौरान उन्होंने लोकभाषा, लोकसंगीत और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत पर भी जोर दिया।

‘लोगवा देत काहे गारी’ की प्रस्तुति से गूंजा मंच

कार्यक्रम के दौरान मैथिली ठाकुर ने ‘लोगवा देत काहे गारी…’ जैसे पारंपरिक गीत की प्रस्तुति दी। गीत की प्रस्तुति के दौरान समारोह में मौजूद लोगों ने लोकसंगीत का आनंद लिया।

यह गीत मिथिला और उत्तर बिहार की पारंपरिक विवाह-संगीत परंपरा से जुड़ा माना जाता है। गारी गीतों में आमतौर पर हास्य, तंज और पारिवारिक माहौल को हल्का-फुल्का बनाने की शैली देखने को मिलती है।

सनातन संगीत और लोकगीतों पर मैथिली ठाकुर की बात

समारोह में मैथिली ठाकुर ने सनातन संगीत और भजनों को परिवार तथा समाज में स्थान देने की बात कही। उनके अनुसार, लोकगीत और क्षेत्रीय भाषाओं का संगीत नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को लोकभाषा, लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत से परिचित कराने की अपील भी की।

क्षेत्रीय भाषाओं के कलाकारों को मिल रहा नया मंच

मैथिली ठाकुर ने क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने वाले कलाकारों की बढ़ती लोकप्रियता का भी उल्लेख किया। आज मैथिली, भोजपुरी सहित कई भारतीय भाषाओं में गीत और भजन डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए देश-दुनिया तक पहुंच रहे हैं।

इस बदलाव से स्थानीय भाषाओं के कलाकारों को अपने क्षेत्र से बाहर भी श्रोताओं तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है।

पंडित सहदेव झा को किया याद

कार्यक्रम का आयोजन स्वतंत्रता सेनानी और बिहार विभूति पंडित सहदेव झा की स्मृति में किया गया था। समारोह में उनके स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े योगदान और संघर्ष को याद किया गया।

मैथिली ठाकुर ने स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और संघर्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

पंडित सहदेव झा के लिए भारत रत्न की मांग

समारोह के दौरान पंडित सहदेव झा को भारत रत्न देने और उनकी जीवनी को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग भी उठी। यह मांग कार्यक्रम में मौजूद लोगों और वक्ताओं की ओर से रखी गई थी।

यहां इसे मांग के रूप में ही लिखना जरूरी है, किसी सरकारी निर्णय के रूप में नहीं।

पाग-शाल से हुआ सम्मान

कार्यक्रम के आयोजकों की ओर से मैथिली ठाकुर को पाग और शाल देकर सम्मानित किया गया। समारोह की अध्यक्षता अशोक झा ने की और संचालन कुंदन शांडिल्य ने किया।

कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी मौजूद रहे।

मिथिला की लोकपरंपरा के लिए क्यों खास है यह प्रस्तुति?

मिथिला की सांस्कृतिक पहचान में लोकगीत, विवाह गीत, गारी गीत और भजन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनमें स्थानीय भाषा, सामाजिक परंपराओं और पारिवारिक संबंधों की झलक भी मिलती है।

मैथिली ठाकुर जैसे कलाकार जब इन पारंपरिक गीतों को बड़े मंचों पर प्रस्तुत करते हैं, तो स्थानीय लोकसंगीत को नई पीढ़ी और नए श्रोताओं तक पहुंचने का अवसर मिलता है।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की जरूरत

आज युवा पीढ़ी का संगीत सुनने का तरीका तेजी से बदल रहा है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण संगीत कुछ ही समय में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच सकता है।

ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं के कलाकारों और लोकसंगीत को डिजिटल माध्यमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाना मिथिला जैसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण में उपयोगी हो सकता है।

निष्कर्ष

मुजफ्फरपुर के पंडित सहदेव झा स्मृति समारोह में मैथिली ठाकुर की प्रस्तुति ने लोकसंगीत, भजन और मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा को केंद्र में रखा। कार्यक्रम में उनके गीतों के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने का संदेश भी प्रमुख रहा।

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