पश्चिमी सिंहभूम के सांगाजाटा गांव ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर माओवादी आतंक से मुक्ति का ‘दोहरी आजादी’ का जश्न मनाया। दो दशक बाद माओवाद मुक्त हुए इस क्षेत्र में पुलिस अधिकारियों ने ग्रामीणों के साथ तिरंगा फहराया और विकास की नई राह खोली।

चाईबासा। जब पूरा देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, उसी समय पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा-कोल्हान के घने जंगलों के बीच बसे सुदूर सांगाजाटा गांव में सुबह करीब छह बजे ‘दोहरी आजादी’ का जश्न शुरू हो चुका था।

अरहासा पंचायत के इस दुर्गम गांव ने इस बार देश की स्वतंत्रता के साथ करीब दो दशक तक कायम रहे माओवादी भय और आतंक से मिली मुक्ति का भी उत्सव मनाया।

बारिश के दिनों में छोटी-बड़ी धाराओं के उफान के कारण सांगाजाटा का संपर्क अक्सर कट जाता है। ऐसे में 15 अगस्त की सुबह पहली बार किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का गांव पहुंचना ग्रामीणों के लिए ऐतिहासिक अनुभव रहा।

पश्चिमी सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक अमित रेणु, के निर्देश पर अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी, चक्रधरपुर डॉ. सैयद मुस्तफा हाशमी, गोइलकेरा थाना प्रभारी विजांत मुंडा समेत पुलिसकर्मी सुबह करीब 5:30 बजे सांगाजाटा पहुंचे अधिकारियों ने ग्रामीणों के साथ मिलकर राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

कभी माओवाद का प्रमुख गढ़ था सांगाजाटा

अरहासा पंचायत और आसपास के क्षेत्र में कभी करीब 90 से 100 ग्रामीण माओवादी गतिविधियों से जुड़े या सक्रिय रहे थे। इनमें सांगाजाटा गांव के करीब 15 लोग शामिल थे।

कुख्यात माओवादी सगेन अंगरिया भी इसी क्षेत्र में सक्रिय था। उस पर पांच लाख रुपये का इनाम था और उसके खिलाफ 124 आपराधिक मामले दर्ज बताए गए थे।

माओवादी गतिविधियों के दौर में सुरक्षा बलों और आम नागरिकों पर हमले, आइईडी विस्फोट, हत्याएं और रंगदारी जैसी घटनाएं होती रही थीं। क्षेत्र में सुरक्षा बलों के साथ कई महत्वपूर्ण मुठभेड़ और गोलीबारी की घटनाएं भी हुईं।

करीब दो दशकों तक माओवादी भय का असर ग्रामीणों के सामान्य जीवन पर रहा। माओवादी हिंसा में क्षेत्र के 40 से अधिक नागरिकों की जान गई।

ग्रामीणों को बंदूक के बल पर माओवादियों को राशन, रसद और अन्य सहयोग देने के लिए मजबूर किया जाता था। इससे पुलिस और ग्रामीणों के बीच भी लंबे समय तक अविश्वास की स्थिति बनी रही।

अंतिम माओवादियों के आत्मसमर्पण के चार दिन बाद बदली तस्वीर

सांगाजाटा में इस बार स्वतंत्रता दिवस का उत्साह इसलिए भी खास था क्योंकि महज चार दिन पहले, 11 अगस्त को ऑपरेशन नवजीवन-III के तहत अंतिम तीन माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद पश्चिमी सिंहभूम को माओवादमुक्त घोषित किया गया था। वर्षों से भय के साये में रहे ग्रामीणों के लिए यह बदलाव एक नई शुरुआत का संकेत था।

ग्रामीणों से संवाद करते हुए डॉ. सैयद मुस्तफा हाशमी ने कहा कि पुलिस और सुरक्षा बलों के वर्षों के सतत एवं अथक प्रयासों के बाद क्षेत्र के लोग माओवादी उग्रवाद के भय और दमन से मुक्त हुए हैं। अब उनके लिए विकास की राह पूरी तरह खुल गई है। जिला पुलिस और प्रशासन के निरंतर प्रयासों से क्षेत्र मुख्यधारा से जुड़ रहा है।

सड़क, नेटवर्क और पुल खोल रहे विकास की राह

क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क टावर की स्थापना, सड़कों का निर्माण और गांव-पंचायत को वर्षभर संपर्क सुविधा उपलब्ध कराने के लिए पुल का निर्माण इस बदलाव के महत्वपूर्ण संकेत हैं।

कभी माओवादी गतिविधियों के कारण दुर्गम और अलग-थलग रहने वाला यह क्षेत्र अब बुनियादी सुविधाओं और विकास की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद कर रहा है।

पुलिस अधिकारी ने लगाया स्वास्थ्य शिविर

स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान एएसपी डॉ. सैयद मुस्तफा हाशमी ने अपनी चिकित्सकीय विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य शिविर भी लगाया।

उन्होंने ग्रामीणों की स्वास्थ्य जांच की और आवश्यक उपचार एवं चिकित्सकीय परामर्श दिया। इससे ग्रामीणों और पुलिस-प्रशासन के बीच भरोसे की नई तस्वीर भी सामने आई।

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