स्वतंत्रता दिवस पर झारखंड के 5 महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को याद करें, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांति की ज्वाला जलाई थी. जानें उनके अदम्य साहस और बलिदान की अनसुनी कहानियां.
रांची: स्वतंत्रता दिवस का पावन अवसर केवल देश की आजादी का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि उन अनगिनत वीरों को नमन करने का समय है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दे दिया था. देश की आजादी की जब भी बात होती है, तो झारखंड की माटी और यहां के आदिवासी जननायकों का बड़ा योगदान है. अंग्रेजों के दमनकारी शासन, जल-जंगल-जमीन की लूट और शोषण के खिलाफ जब पूरा देश धीरे-धीरे गोलबंद हो रहा था, उससे पहले ही झारखंड के जंगलों में क्रांति की ज्वाला धधक उठी थी. 15 अगस्त के इस ऐतिहासिक अवसर पर आज हम झारखंड के उन 5 महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को याद करेंगे, जिनके नाम से ही ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों और सेना के पसीने छूट जाते थे.
भगवान बिरसा मुंडा: जिन्होंने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव
झारखंड के छोटानागपुर की धरती पर जन्मे ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए थे. 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी मुंडारी ‘खुंटकट्टी’ व्यवस्था की समाप्ति और जमींदारों के शोषण के खिलाफ ‘उलगुलान’ का शंखनाद किया था. बिरसा मुंडा के कुशल नेतृत्व, छापामार युद्ध रणनीति और विशाल जनसमर्थन से अंग्रेज अफसर इतने खौफजदा थे कि उन्हें बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए अपनी पूरी सेना झोंकनी पड़ी थी. मात्र 25 वर्ष की में अंग्रेजों की हिरासत में उनकी शहादत हो गई, लेकिन उनका उलगुलान आज भी हर भारतीय को अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देता है.
बाबा तिलका मांझी: जिन्होंने ब्रिटिश कलेक्टर को तीर से मार गिराया था
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी लगभग आठ दशक पहले अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बाबा तिलका मांझी भारत के पहले आदिवासी क्रांतिकारी थे. उन्होंने 1784 में संथाल परगना के जंगलों से ‘तिलका आंदोलन’ का नेतृत्व किया था. बाबा तिलका मांझी के अद्भुत अचूक निशानेबाजी और अदम्य साहस का खौफ अंग्रेजों में इस कदर था कि भागलपुर का क्रूर ब्रिटिश कलेक्टर क्लीवलैंड उनके नाम से ही थर्राता था. तिलका मांझी ने एक ताड़ के पेड़ पर छिपकर क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर से ढेर कर दिया था. इस घटना ने पूरे ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया था और बाद में अंग्रेजों ने छल-बल से उन्हें गिरफ्तार कर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी थी.
सिदो-कान्हू: जिनके एक आह्वान पर उठ खड़े हुए थे 30 हजार योद्धा
30 जून 1855 को शुरू हुआ ‘संथाल हूल’ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ भारत का सबसे संगठित और भीषण आदिवासी विद्रोह माना जाता है. भोगनाडीह की माटी में जन्मे दो सगे भाइयों, सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने संथाल परगना में अंग्रेजों, महाजनों और दलालों के गठजोड़ के खिलाफ बिगुल फूंका था. सिदो-कान्हू के एक आह्वान पर पारंपरिक हथियारों (धनुष-बाण और कुल्हाड़ी) से लैस 30,000 से अधिक संथाल आदिवासी एकजुट हो गए थे. उनके इस विशाल जनसैलाब और आक्रामक रणनीति से अंग्रेज अफसर इतने डर गए थे कि भागलपुर से लेकर बीरभूम तक ब्रिटिश शासन की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी. बाद में उन्हें मार्शल लॉ लगाना पड़ा था.
जतरा टाना भगत: अहिंसा और ‘टाना आंदोलन’ के जननायक
गुमला जिले के चिंगरी नवटोली में जन्मे जतरा टाना भगत ने अंग्रेजों के खिलाफ एक अनोखा और अभूतपूर्व आंदोलन चलाया था. 1914 में उन्होंने ‘टाना भगत आंदोलन’ की शुरुआत की, जो धार्मिक और सांस्कृतिक सुधार के साथ-साथ अंग्रेजों के खिलाफ एक सशक्त अहिंसक सत्याग्रह था. जतरा भगत के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों को लगान (टैक्स) देने, जमींदारों की बेगारी करने और ब्रिटिश सामानों का उपयोग करने से साफ इनकार कर दिया था. बिना एक भी हथियार उठाए केवल आत्मबल और पूर्ण असहयोग के दम पर उन्होंने अंग्रेजों के राजस्व तंत्र की कमर तोड़ दी थी. उनके विचारों के प्रभाव से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर कड़ी प्रताड़ना दी थी, जिसके बाद वे शहीद हो गए.
वीर बुधु भगत: ‘कोल विद्रोह’ के अमर सेनानी
रांची के चान्हो (सिल्ली/टीको) क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले वीर बुधु भगत 1831-32 के ऐतिहासिक ‘कोल विद्रोह’ के मुख्य सूत्रधार थे. उन्होंने छोटानागपुर के पठारी इलाकों में ब्रिटिश शासन और दमनकारी नीतियों के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट कर गुरिल्ला युद्ध लड़ा था. बुधु भगत की युद्ध कला, अदम्य साहस और जनता में उनकी जबरदस्त पैठ का अंग्रेजों में इतना खौफ था कि कैप्टन इमपे जैसे अधिकारियों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए तत्कालीन समय में 1,000 रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित किया था. अंग्रेजों की पूरी सैन्य टुकड़ी ने जब उन्हें घेरा, तो वे अपने पुत्रों और सैकड़ों समर्थकों के साथ अंतिम सांस तक लड़ते हुए शहीद हो गए थे.
