Mithilani

मिथिलांचल में 14 सितंबर को चौठ चंद्र पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा. यह पर्व भगवान चंद्रदेव की उपासना और पारिवारिक मंगलकामना को समर्पित है, जो मिथिला की समृद्ध लोकपरंपरा का अभिन्न अंग है. दिनभर उपवास रखकर, विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.

मधुबनी: मिथिला की सांस्कृतिक चेतना और लोकआस्था का प्रतीक चौठ चंद्र पर्व इस वर्ष 14 सितंबर को श्रद्धा, भक्ति और पारिवारिक मंगलकामना के साथ मनाया जायेगा. भाद्र शुक्ल चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान चंद्रदेव की उपासना को समर्पित है. मिथिला की लोकपरंपरा में चौठ चंद्र का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है.

दिनभर उपवास रखकर की जाती है चंद्रदेव की पूजा

चौठ चंद्र के दिन व्रती महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं. संध्या समय विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है. घर के आंगन में अरिपन बनाया जाता है और चंद्रदेव को विभिन्न प्रकार के फल, पकवान और नैवेद्य अर्पित किये जाते हैं.

इसके बाद चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है. मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक चंद्रदेव की आराधना करने से परिवार में सुख-समृद्धि, शांति और सौभाग्य का वास होता है.

शीतलता और मन की शांति का प्रतीक है चंद्रमा

आध्यात्मिक दृष्टि से चौठ चंद्र मनुष्य को प्रकृति और ब्रह्मांड के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है. चंद्रमा को शीतलता, संतुलन और मन की शांति का प्रतीक माना गया है.

यह पर्व जीवन की भागदौड़ के बीच मन को संयमित रखने और विचारों को निर्मल बनाने का संदेश भी देता है. पूजा-अर्चना के माध्यम से श्रद्धालु प्रकृति और ब्रह्मांड के प्रति अपनी आस्था एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हैं.

मिथिला की जीवंत लोकपरंपरा है चौठ चंद्र

मिथिला में चौठ चंद्र केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, पारिवारिक एकता और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था की जीवंत विरासत है.

घर-आंगन में सजती पूजा की थाली और चंद्रदेव की ओर उठती श्रद्धा भरी आंखें मिथिला की आध्यात्मिक समृद्धि को अभिव्यक्त करती हैं. पर्व के माध्यम से परिवार और समाज में सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने की भावना भी मजबूत होती है.

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