दरभंगा: मिथिला की पहचान से जुड़े मखाना को खेतों से निकालकर बड़े बाजार और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की कोशिश की कहानी दरभंगा से सामने आई है। टेक्सास में कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में करियर बना रहे राजीव रंजन ने अपनी नौकरी छोड़कर मखाना किसानों के साथ काम करने का रास्ता चुना। उनका उद्देश्य किसानों की समस्याओं को समझना, मखाना उत्पादन में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना रहा है।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय तकनीकी क्षेत्र में काम किया, लेकिन मिथिला के मखाना किसानों की स्थिति और इस पारंपरिक फसल की संभावनाओं ने उन्हें कृषि क्षेत्र की ओर आकर्षित किया। इसके बाद उन्होंने मखाना उत्पादन से जुड़े किसानों के बीच जाकर जमीनी स्तर पर काम शुरू किया।
दरभंगा से दालकोला तक किसानों से किया संवाद
मखाना क्षेत्र को समझने के लिए राजीव रंजन ने दरभंगा से दालकोला तक का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने छह जिलों में मखाना की खेती करने वाले किसानों से मुलाकात की और खेती की वास्तविक परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया।
उन्होंने किसानों से उत्पादन, खेती की तकनीक, बाजार, कीमत और मखाना तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ी समस्याओं के बारे में जानकारी ली। इसके बाद मखाना को लेकर उन्होंने अनुसंधान का काम शुरू किया और कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लिया।
उनकी कोशिश केवल मखाना की बिक्री तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी प्रक्रिया को समझने और उसमें सुधार की संभावनाएं तलाशने पर केंद्रित रही।
मखाना की कीमत और बाजार पर फोकस
राजीव रंजन के अनुसार, उनके प्रयासों के दौरान मखाना की कीमत 280 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 1200 रुपये प्रति किलो तक पहुंची। हालांकि कीमत में बदलाव कई बाजार और उत्पादन संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर करता है, उनके प्रयासों का एक प्रमुख लक्ष्य किसानों को बेहतर मूल्य और बाजार से जोड़ना रहा।
मखाना किसानों के लिए उचित बाजार उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उत्पादन के बाद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना पूरी कृषि श्रृंखला का अहम हिस्सा है।
G20 सम्मेलन तक पहुंचाने की कोशिश
मखाना को बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाने के प्रयास में राजीव रंजन ने इसे G20 सम्मेलन में शामिल कराने की दिशा में भी काम किया। उनके अनुसार, इस प्रस्ताव को लेकर कई स्तरों पर प्रयास किए गए और शुरुआत में प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ।
बाद में 24 अगस्त 2023 को G20 सम्मेलन में काजू की जगह मखाना रखने पर सहमति बनी। इस पहल को मिथिला के मखाना उत्पादकों के लिए बड़े मंच पर अपनी उपज को प्रस्तुत करने के अवसर के रूप में देखा गया।
इस तरह स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाला मखाना धीरे-धीरे राष्ट्रीय चर्चा और बड़े आयोजनों का हिस्सा बनने लगा।
मनीगाछी में बनाया गया FPC
मखाना किसानों को संगठित करने की दिशा में दरभंगा के मनीगाछी में Farmer Producer Company (FPC) का गठन किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसमें फिलहाल 853 लोगों ने पंजीकरण कराया है, जबकि करीब 2700 लोग इससे जुड़े हैं।
FPC के माध्यम से किसानों को एक साथ लाने और उन्हें बाजार, तकनीक तथा उत्पादन से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।
राजीव रंजन का लक्ष्य इस मॉडल को आगे विस्तार देकर करीब 5 लाख लोगों को जोड़ने का है। यह लक्ष्य बड़ा है और इसे हासिल करने के लिए संगठन, बाजार, तकनीक और किसानों की निरंतर भागीदारी की आवश्यकता होगी।
मखाना को बड़े मंचों तक पहुंचाने का प्रयास
मिथिला के मखाना को केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रखने के बजाय देश और विदेश के बड़े मंचों तक पहुंचाने की कोशिश भी की गई है। इसके तहत मखाना को World Food India, IITF, अंतरराष्ट्रीय कृषि एवं आर्थिक विकास परिषद सम्मेलन और महाकुंभ जैसे आयोजनों में प्रदर्शित किए जाने की जानकारी दी गई है।
इन आयोजनों के जरिए मखाना की पहचान को व्यापक बाजार तक ले जाने और इससे जुड़े किसानों की मेहनत को सामने लाने का प्रयास किया गया।
किसानों को तकनीक और बाजार से जोड़ने पर जोर
मखाना उत्पादन में किसानों के सामने खेती की तकनीक, उत्पादन लागत, बाजार और उचित मूल्य जैसे कई स्तरों पर चुनौतियां होती हैं। ऐसे में किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उन्हें बाजार और तकनीकी जानकारी से जोड़ना भी महत्वपूर्ण है।
राजीव रंजन की पहल का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों को इसी पूरी प्रक्रिया से जोड़ना बताया गया है। उनका प्रयास है कि मखाना उत्पादक किसान अपनी उपज के बेहतर मूल्य के साथ-साथ आधुनिक तकनीक और व्यापक बाजार तक पहुंच बना सकें।
टेक्नोलॉजी से खेती तक का सफर
राजीव रंजन की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्होंने तकनीकी क्षेत्र में करियर बनाने के बाद कृषि और किसानों के बीच काम करने का रास्ता चुना। टेक्सास में कंप्यूटर इंजीनियर की नौकरी से मखाना किसानों के बीच पहुंचने तक का यह बदलाव उनके व्यक्तिगत करियर के साथ-साथ मिथिला की कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक अलग अनुभव सामने रखता है।
उनकी पहल का केंद्र मखाना है, लेकिन इसके पीछे किसानों को संगठित करने, बाजार से जोड़ने और पारंपरिक कृषि उत्पाद को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप आगे ले जाने की कोशिश दिखाई देती है।
मिथिला के मखाना को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा
मिथिला क्षेत्र में मखाना लंबे समय से खेती और स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहा है। अब इसके उत्पादन को बेहतर बाजार, ब्रांडिंग और तकनीक से जोड़ने की कोशिशें इसे बड़े स्तर पर पहुंचाने की संभावनाएं पैदा करती हैं।
राजीव रंजन का प्रयास इसी दिशा में किसानों को एक मंच पर लाने और मखाना की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने पर केंद्रित है। आने वाले समय में FPC का विस्तार और किसानों की भागीदारी इस पहल की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
टेक्सास की नौकरी से मिथिला के खेतों तक पहुंची यह यात्रा बताती है कि स्थानीय कृषि उत्पाद को लेकर काम केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। तकनीक, संगठन, बाजार और किसानों की भागीदारी को साथ लेकर चलने पर पारंपरिक उत्पाद को नए बाजारों तक पहुंचाने के रास्ते तैयार किए जा सकते हैं।
