1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जमुई के रामचरण लोहार, सहदेव हलवाई और मिश्री नोनिया जैसे गुमनाम वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं. इन क्रांतिकारियों को 10 साल की जेल और 10 बेंत की सजा मिली, लेकिन आजादी के बाद उनके परिवार आज भी आर्थिक तंगी झेल रहे हैं.
देश की आजादी का इतिहास केवल बड़े नेताओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जमुई जैसे जिलों के उन गुमनाम वीरों का भी खून-पसीना शामिल है जिन्होंने अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया. बरहट प्रखंड के मलयपुर निवासी रामचरण लोहार, सहदेव हलवाई और मिश्री नोनिया ऐसे ही अमर क्रांतिकारी थे, जिन्होंने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं. आजादी के बाद इन नायकों को सरकार से ‘ताम्रपत्र’ का सम्मान तो मिला, लेकिन आज इनके परिवार घोर आर्थिक तंगी और लोहे की भट्ठी के पास गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.
1942 में नवयुवकों की टोली ने फूंका था बगावत का बिगुल
वर्ष 1942 में जब पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ उबाल था, तब जमुई के युवाओं ने भी मौत की परवाह किए बिना बगावत का रास्ता चुना:
- बनी युवाओं की फौज: रामचरण लोहार, सहदेव हलवाई और मिश्री नोनिया के नेतृत्व में कामा सिंह, महादेव सिंह, संत कुमार सिंह, कैलाश रावत और मोहन सिंह जैसे युवाओं ने एक मजबूत टोली बनाई.
- अंग्रेजी व्यवस्था पर चोट: इस टीम ने अंग्रेजी संचार और परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह ठप करने का जिम्मा उठाया. रेल की पटरियां उखाड़ने, आगजनी करने और टेलीफोन के तार काटने जैसी साहसिक घटनाओं से स्थानीय अंग्रेजी प्रशासन में दहशत फैल गई.
मुखबिरों के बिछाए जाल में फंसे, मिली 10 बेंत की खौफनाक सजा
क्रांतिकारियों के खौफ से परेशान अंग्रेजी फौज को जमुई भेजा गया. युवाओं को सीधे पकड़ना मुश्किल था, इसलिए अंग्रेजों ने लालच देकर स्थानीय मुखबिरों का जाल बिछाया:
- अपनों ने किया धोखा: मुखबिरी के आधार पर रामचरण लोहार को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि सहदेव हलवाई और मिश्री नोनिया को गिद्धेश्वर जंगल से धर दबोचा गया.
- क्रूर सजा का ऐलान: अंग्रेजी अदालत ने इन वीर सपूतों को 10 वर्ष के कठोर कारावास और 10 बेंत (कोड़े) मारने की अमानवीय सजा सुनाई. इस सजा का मकसद स्थानीय युवाओं में खौफ पैदा करना था, लेकिन क्रांतिकारियों का हौसला नहीं टूटा.
ताम्रपत्र मिला, लेकिन दूर नहीं हुई परिवार की मुफलिसी
15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने के बाद सरकार ने इन वीरों को ताम्रपत्र और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति जस की तस रही:
- गरीबी में बीता जीवन: रामचरण लोहार ने घोर अभाव और गरीबी में अपना जीवन बिताया और इसी तंगी के बीच दुनिया को अलविदा कह दिया.
- लोहे की भट्ठी तक सीमित हुई विरासत: आज भी उनके परिवार की नई पीढ़ी अपने पुश्तैनी लोहार के काम और लोहे की भट्ठी के सहारे किसी तरह पेट पाल रही है. आर्थिक तंगी के कारण सेनानियों के बच्चों को बेहतर शिक्षा तक नसीब नहीं हो सकी.
इतिहास के पन्नों में मिले उचित सम्मान
आज जब देश आजादी का जश्न मनाता है, तब जमुई के इन गुमनाम नायकों का संघर्ष एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. इन युवाओं ने अपने परिवार और निजी सुख-सुविधाओं से ऊपर देश को रखा. आज जरूरत है कि रामचरण लोहार और उनके साथियों के बलिदान के साथ-साथ उनके परिवारों के संघर्ष को इतिहास के पन्नों और सरकारी योजनाओं में उचित स्थान मिले, ताकि नई पीढ़ी यह जान सके कि आजादी की कीमत गांव-गांव के युवाओं ने अपनी जवानी कुर्बान करके चुकाई है.
