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बिहार के पूर्णिया जिले का स्वतंत्रता संग्राम में गौरवशाली इतिहास रहा है, जहां 51 वीरों ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया. कई गुमनाम नायकों के बलिदान की यह अनकही कहानी नई पीढ़ी को जानना बेहद जरूरी है.

देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने में बिहार के पूर्णिया जिले का आंदोलनात्मक सफर बेहद गौरवशाली रहा है. यहां के वीर सपूतों ने अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर हंसते-हंसते सीने पर गोलियां खाईं. विडंबना यह है कि स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले कई नायकों की यादें आज गुमनामी के अंधेरे में खो गई हैं. आज की नई पीढ़ी को यह जानना बेहद जरूरी है कि भारत की आजादी की लड़ाई में पूर्णिया ने कितनी अहम भूमिका निभाई थी. आइए, जानते हैं उन अमर सेनानियों की अनकही कहानी, जिनके त्याग और बलिदान ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी.

बापू के आह्वान पर टीकापट्टी में फूंका गया था नमक आंदोलन का बिगुल

12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से नमक कानून के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन की नींव रखी थी. बापू के इस आह्वान पर पूर्णिया में भी रुपौली के टीकापट्टी स्थित ‘कारी कोशी’ नदी के तट पर नमक बनाकर आंदोलन का बिगुल फूंका गया. इस आंदोलन में अशर्फी लाल वर्मा और उनके क्रांतिकारी साथी प्रमुख रूप से उभर कर सामने आए. अंग्रेजी अफसरों ने उनकी गिरफ्तारी के लिए कड़ी मोर्चाबंदी की, लेकिन वे चकमा देकर पूरे जिले में अलख जगाते रहे. बोकाय मंडल, अनाथकांत बसु, के एल कुण्डू सहित कई नेताओं ने जिला कांग्रेस कमेटी का गठन कर इस आंदोलन को सफल बनाया. हालांकि, बाद में अशर्फी बाबू को गिरफ्तार कर एक साल के लिए हजारीबाग जेल भेज दिया गया. जेल से छूटने के बाद जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस पूर्णिया आए थे, तो उनके स्वागत की मुख्य जिम्मेदारी अशर्फी बाबू ने ही निभाई थी.

बनमनखी में उखाड़ी रेल पटरियां, मिली थी फांसी की सजा

सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में पूर्णिया के वीरों ने अभूतपूर्व बगावत का परिचय दिया. बनमनखी थाना क्षेत्र के दमगड़ा गांव के स्व. अनुप लाल मेहता और स्व. हरिकिशोर यादव (पूर्णिया कालेज के पूर्व प्राचार्य डा. राजीव नंदन यादव के पिता) ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया. स्व. मेहता की अगुवाई में विशाल जनसमूह ने बनमनखी और उसके आसपास की रेल पटरियां उखाड़ दीं. इतना ही नहीं, उग्र भीड़ ने थाने पर कब्जा कर वहां शान से तिरंगा फहरा दिया. अंग्रेजी हुकूमत ने इस बगावत के लिए उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने बरी कर दिया.

रुपौली का रौद्र रूप: थाने पर कब्जा कर 3 अंग्रेज अफसरों को किया जिंदा खाक

25 अगस्त 1942 का दिन पूर्णिया के इतिहास के सबसे आक्रामक पलों में दर्ज है. सरसी के नरसिंह नारायण सिंह की अगुवाई में आंदोलनकारियों ने न केवल रुपौली थाने पर कब्जा कर लिया, बल्कि बौखलाहट में तीन अंग्रेज अफसरों को जिंदा जला दिया. इस भयानक बगावत को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने दमन का रास्ता अपनाया और धमदाहा में 25 निहत्थे आंदोलनकारियों को गोलियों से भून डाला. इसी तरह बनमनखी में चार लोग और तत्कालीन पूर्णिया जिले के कटिहार थाने में तिरंगा फहराने के दौरान छात्र ध्रुव कुंडू अंग्रेजों की गोली के शिकार हुए. कुल मिलाकर तत्कालीन पूर्णिया जिले के 51 रणबांकुरों ने देश की वेदी पर अपनी जान कुर्बान कर दी थी.

पूर्णिया का गौरवशाली इतिहास: एक नजर में

आजादी के दीवानों और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी अहम यादें जो आज भी शेष हैं:

  • 1918: पुण्यानंद झा ने अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन का रास्ता चुना.
  • 12 मार्च 1930: टीकापट्टी नदी किनारे नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को दी गई चुनौती.
  • 1931: रुपौली के स्वराज आश्रम में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का आगमन.
  • 10 अप्रैल 1934: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का टीकापट्टी स्वराज आश्रम पहुंचना.
  • 1936: सविनय अवज्ञा आंदोलन में डॉ. किशोरी लाल कुंडू प्रमुखता से उभर कर सामने आए.
  • 1940: व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान डॉ. लक्ष्मी नारायण सुधांशु को जेल भेजा गया.
  • 24 अगस्त 1942: पूर्णिया जेल में बंद स्वाधीनता सेनानियों और कैदियों पर अंग्रेजी पुलिस ने बरसाईं लाठियां.
  • 25 अगस्त 1942: आंदोलनकारियों का रुपौली थाने पर कब्जा और 3 अंग्रेज अफसरों को जिंदा जलाना.
  • 26 अगस्त 1942: प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी सतीनाथ भादुड़ी को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया.
  • शहादत: धमदाहा में 25, बनमनखी में 4 और तत्कालीन पूर्णिया जिले में कुल 51 वीरों ने देश के लिए अपनी जान दी.

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