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मिथिलानी न्यूज डेस्क। दीपावलीक राति जतय देशक अधिकांश हिस्सा पटाखाक आवाज आ रंग-बिरंग रोशनीसँ जगमगा उठैत अछि, ओतहि मिथिलांचलक बेनीपुरमे दिवाली मनयबाक एकटा अलग आ पुरान परंपरा आइयो जीवित अछि। एतय लोक पटाखाक शोरक बदला संठी आ खर सँ बनल हुक्का-पाती जरा क’ दीपावली मनबैत छथि।

ई परंपरा मिथिलाक ग्रामीण संस्कृतिक अनूठ पहचान अछि। खास बात ई जे आधुनिकताक दौरमे सेहो गामक युवा आ बुजुर्ग मिलि-जुलि एहि परंपराकेँ आगू बढ़ा रहल छथि। Gen Z पीढ़ी लेल ई एकटा नव आ रोचक अनुभव बनि सकैत अछि।

दीपावलीक साँझ जखन घर-आँगन दीपक रोशनीसँ जगमगा उठैत अछि, तखन बेनीपुरक गामसभक गलीमे हुक्का-पातीक लपट एकटा अलग दृश्य प्रस्तुत करैत अछि। पटाखाक कानफोड़ू आवाजसँ दूर, लोक अपन पारंपरिक मशाल जरा क’ उत्सव मनबैत छथि।

संठी आ खर सँ बनैत अछि हुक्का-पाती

हुक्का-पाती तैयार करबाक लेल मुख्य रूपसँ संठी आ खरक उपयोग कयल जाइत अछि। संठी अर्थात् पटसनक सुखायल डंठल। ग्रामीण लोक पहिनेसँ संठी जमा क’ सुरक्षित राखैत छथि।

दीपावलीक दिन संठीकेँ छोट-छोट टुकड़ामे काटल जाइत अछि। तकर बाद ओकरा खरक संग मजबूतीसँ बान्हि देल जाइत अछि, जाहिसँ हाथमे पकड़बाक लेल मशाल सन आकार बनि जाइत अछि।

साँझ होइतहि युवा आ बुजुर्ग हुक्का-पाती ल’ घरसँ बाहर निकलैत छथि। एकर जरैत लपटसँ गामक गली-रस्ता रोशन भ’ उठैत अछि।

सामूहिकताक प्रतीक अछि ई परंपरा

बेनीपुरक पंडित रामनारायण झाक अनुसार, उक्का-पातीक ई परंपरा दीपावलीक उत्सवकेँ आपसी मेल-जोल आ सामूहिकतासँ जोड़ैत अछि। घरमे माता लक्ष्मी आ भगवान गणेशक पूजा पूरा होयबाक पहिनहि ग्रामीण लोक हुक्का-पाती तैयार करबामे जुटि जाइत छथि।

गामक युवा अपन हाथसँ हुक्का-पाती बनेबामे रुचि देखबैत छथि, जखन कि बुजुर्ग हुनका एहि परंपराक पुरान तरीका आ नियमसभ बुझबैत छथि।

एहि तरहें दीपावली केवल धार्मिक पर्वे नहि रहि जाइत अछि, बल्कि परिवार आ समाजक लोकसभकेँ एक संग आनबाक अवसर सेहो बनैत अछि।

बच्चासभमे आइयो देखाइत अछि उत्साह

गामक बुजुर्ग दिनेश्वर झा, राम सुरेश झा आ नरेश बतबैत छथि जे पहिने दीपावलीक राति उक्का-पातीक विशेष महत्व छल। ओहि समय आइ जेकाँ आधुनिक रंग-बिरंगक आतिशबाजी आ बाजारमे पटाखाक भरमार नहि छल।

ग्रामीण लोक अपन सीमित साधनसँ संठी आ खरक उक्का-पाती तैयार करैत छलाह। बच्चासभ कतेको दिन पहिनेसँ एकरा लेल संठी जमा करब शुरू क’ दैत छल।

आइ समय बदलि गेल अछि आ बाजारमे तरह-तरहक पटाखा उपलब्ध अछि, मुदा हुक्का-पातीक आकर्षण एखनहुँ कम नहि भेल अछि।

कोना कयल जाइत अछि हुक्का-पाती?

मिथिला, कोसी आ अंग क्षेत्रमे हुक्का-पाती अथवा उक्का-पाती दीपावलीक रातिक एकटा पुरान लोकपरंपरा मानल जाइत अछि।

परंपराक अनुसार, पूजा-पाठ पूरा भेलाक बाद घरक सदस्य पूजा घर अथवा आँगनमे जरैत पवित्र दीपसँ अपन-अपन हुक्का-पाती जरबैत छथि। तकर बाद जरैत हुक्का-पाती ल’ घरक विभिन्न कोठली, कोना आ दरबज्जा पर जाइत छथि।

एहि दौरान सभ लोक एक संग पारंपरिक उद्घोष करैत छथि— “लक्ष्मी घर, दरिद्र बाहर।”

ई परंपरा घरमे सुख-समृद्धिक कामना आ नकारात्मकताकेँ दूर करबाक प्रतीक मानल जाइत अछि।

हुक्का-पातीक पाछाँ धार्मिक आ वैज्ञानिक मान्यता

हुक्का-पातीक परंपरासँ धार्मिक आ लोकविश्वास जुड़ल अछि। पारंपरिक मान्यताक अनुसार, संठी आ खर जरयलासँ निकलयवला धुआँ आ गर्मी घर आ आसपासक वातावरणकेँ शुद्ध करैत अछि। किछु जानकारसभक दावा अछि जे एहि धुआँसँ छोट-छोट कीट-पतंगासभ दूर होइत अछि।

धार्मिक दृष्टिसँ एकरा घरसँ नकारात्मकता दूर करबाक आ सकारात्मकता तथा पवित्रताक प्रतीक मानल जाइत अछि। हालाँकि, धुआँसँ बैक्टीरिया वा अन्य सूक्ष्मजीव नष्ट होयबाक दावाक वैज्ञानिक पुष्टि स्रोतमे उपलब्ध नहि अछि।

आधुनिक पीढ़ी लेल अपन संस्कृतिसँ जुड़बाक अवसर

आधुनिक जीवनशैली आ बदलैत समयक बीच बेनीपुरक हुक्का-पातीक परंपरा ग्रामीण संस्कृतिक एकटा महत्वपूर्ण धरोहर बनल अछि। एहि परंपरामे युवा आ बुजुर्ग दुनू पीढ़ी एक संग सहभागी होइत छथि।

ई परंपरा नव पीढ़ीकेँ अपन जड़ि, लोकसंस्कृति आ पारंपरिक रीति-रिवाजसँ परिचित करबाक अवसर दैत अछि। पटाखाक शोरसँ अलग, सामूहिक रूपसँ मनाओल जाएवला ई दिवाली मिथिलांचलक सांस्कृतिक विशिष्टताकेँ दर्शबैत अछि।


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