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‘टेक टाइकून्स की कहानी’ में आज हम जानेंगे Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बू के बारे में. ये वही भारतीय बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने बचपन में स्कूल में फर्श पर बैठकर पढ़ाई की, तमिल मीडियम से पढ़ते हुए IIT Madras और फिर Princeton University तक का सफर तय किया. उन्होंने अपनी PhD को जिंदगी की एक असफलता तक बताया, अमेरिका की अच्छी नौकरी छोड़ी और फिर Zoho जैसी बड़ी टेक कंपनी खड़ी कर दी.

‘टेक टाइकून्स की कहानी’ में आज हम जानेंगे Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बू के बारे में. ये वही भारतीय बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने बचपन में ऐसे स्कूल में पढ़ाई की, जहां बच्चों के बैठने के लिए बेंच तक नहीं थीं. उन्होंने तमिल मीडियम स्कूल से पढ़ाई की, IIT Madras पहुंचे और फिर अमेरिका की Princeton University से PhD की.

लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस PhD को हासिल करना बहुत से लोगों का सपना होता है, श्रीधर वेम्बू ने बाद में उसे अपनी जिंदगी की एक असफलता तक बता दिया. आज उनकी कंपनी Zoho दुनिया की बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों में गिनी जाती है और Google, Microsoft और Salesforce जैसी दिग्गज कंपनियों से मुकाबला करती है. करोड़ों लोग और बड़ी कंपनियां Zoho के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन श्रीधर वेम्बू की कहानी सिर्फ एक सफल कंपनी बनाने की नहीं है.

‘टेक टाइकून्स की कहानी’ की इस कड़ी में आइए जानते हैं श्रीधर वेम्बू के बारे में, जिनके बचपन से लेकर Zoho बनाने तक के सफर में कई ऐसे किस्से हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.

गांव में जन्म, चेन्नई में पढ़ाई और गर्मियों की छुट्टियां गांव में

श्रीधर वेम्बू का जन्म तमिलनाडु के तंजावुर जिले के उमयालपुरम नाम के एक छोटे से गांव में हुआ था. हालांकि, उनका बचपन ज्यादातर चेन्नई में बीता. उनके माता-पिता गांव के बैकग्राउंड से थे और बाद में चेन्नई आकर रहने लगे थे. लेकिन श्रीधर की जिंदगी में गांव हमेशा बना रहा. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि वह गर्मियों की छुट्टियों और दूसरी बड़ी छुट्टियों में अपने पिता के गांव जरूर जाते थे. इसका असर उनकी सोच पर भी पड़ा.

उन्होंने बचपन से ही शहर और गांव, दोनों तरह की जिंदगी को करीब से देखा. शायद यही वजह रही कि जिंदगी में इतनी बड़ी कंपनी बनाने के बाद भी उन्होंने गांव से दूरी नहीं बनाई.

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स्कूल में बेंच नहीं थीं, फर्श पर बैठकर करते थे पढ़ाई

श्रीधर वेम्बू की पढ़ाई किसी महंगे प्राइवेट स्कूल से नहीं हुई थी. उन्होंने चेन्नई के सामान्य सरकारी सहायता वाले स्कूलों में पढ़ाई की. वह 10वीं क्लास तक तमिल मीडियम में पढ़े और अंग्रेजी उनकी दूसरी भाषा थी. उनके बचपन से जुड़ा एक दिलचस्प और कम चर्चित किस्सा यह भी है कि 8वीं क्लास तक उनके स्कूल में बेंच नहीं थीं. बच्चे फर्श पर बैठकर पढ़ाई करते थे.

आज जब स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और आधुनिक सुविधाओं की बात होती है, तब श्रीधर वेम्बू का यह अनुभव काफी अलग लगता है. लेकिन एक और बात और भी दिलचस्प है. उन्होंने बताया था कि उनके स्कूल के दिनों में उन्हें लगभग कभी होमवर्क नहीं मिलता था. इस वजह से उनके पास काफी खाली समय होता था. वह उस समय किताबें पढ़ते, तमिल मैगजीन और उपन्यास पढ़ते और दोस्तों के साथ गली क्रिकेट भी खेलते थे.

सिर्फ 9 साल की उम्र में साइकिल से करने लगे थे चुनाव प्रचार

श्रीधर वेम्बू बचपन से ही सिर्फ पढ़ाई में अच्छे नहीं थे. उन्हें देश-दुनिया और राजनीति में भी काफी दिलचस्पी थी. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब वह सिर्फ 9 साल के थे, तब वह साइकिल से गांव में घूमकर चुनाव प्रचार करते थे. 1977 के चुनाव के दौरान वह Janata Party का समर्थन कर रहे थे. इतनी कम उम्र में राजनीति को लेकर उनकी अपनी राय थी और वह उसे खुलकर जाहिर भी करते थे. यह शायद उनकी जिंदगी का पहला ऐसा दौर था, जब वह सिर्फ दूसरों की बात मानने के बजाय खुद सवाल पूछना और अपनी राय बनाना सीख रहे थे.

14 साल की उम्र में शिक्षकों से पूछते थे, भारत गरीब क्यों है?

श्रीधर वेम्बू के बचपन की एक और दिलचस्प बात उनकी सवाल पूछने की आदत थी. जब वह करीब 14 साल के थे, तब वह अपने शिक्षकों से बार-बार पूछते थे कि भारत इतना गरीब क्यों है? उन्हें अलग-अलग जवाब मिलते थे. कोई ज्यादा जनसंख्या को जिम्मेदार बताता, कोई प्राकृतिक संसाधनों की कमी को वजह कहता और कुछ शिक्षक दूसरे तरह की राजनीतिक बातें करते थे.

लेकिन श्रीधर को आसानी से कोई जवाब संतुष्ट नहीं करता था. वह अपने शिक्षकों से बहस भी करते थे. उनका मानना था कि किसी बात को सिर्फ इसलिए सच नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि कोई बड़ा व्यक्ति या शिक्षक कह रहा है. यह आदत आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी में दिखाई दी. चाहे पढ़ाई का रास्ता हो, नौकरी हो या बिजनेस, उन्होंने हमेशा आम रास्ते से हटकर अपने फैसले लिए.

IIT क्या है, यह भी नहीं जानते थे

आज IIT में एडमिशन लेना लाखों छात्रों का सपना होता है. लेकिन श्रीधर वेम्बू के साथ एक दिलचस्प बात यह थी कि एक समय उन्हें IIT के बारे में ज्यादा जानकारी ही नहीं थी. 11वीं क्लास के दौरान उनके स्कूल में कुछ ऐसे छात्र आए, जो पढ़ाई में काफी अच्छे माने जाते थे. उनमें से एक छात्र ने उन्हें चुनौती दी कि अगर वह इतने अच्छे छात्र हैं तो IIT की परीक्षा देकर दिखाएं.

यहीं से श्रीधर वेम्बू ने IIT की तैयारी शुरू की. तैयारी के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि अब तक जो पढ़ाई उन्होंने की थी, वह IIT प्रवेश परीक्षा के लिए पूरी तरह काफी नहीं थी. खासकर मैथ्स और फिजिक्स के सवाल उन्हें काफी मुश्किल लगे. लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे तैयारी की और आखिरकार IIT Madras में एडमिशन पा लिया. हालांकि, IIT पहुंचने के बाद भी उनकी जिंदगी बिल्कुल फिल्मी तरीके से नहीं बदली.

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IIT में पढ़ाई से ज्यादा बहस और किताबों में थी दिलचस्पी

श्रीधर वेम्बू ने खुद बताया है कि IIT में वह बहुत ज्यादा पढ़ने वाले छात्र नहीं थे. कई बार वह परीक्षा से ठीक पहले पढ़ाई करते और ठीक-ठाक नंबर लेकर आगे बढ़ जाते थे. उन्हें लगता था कि IIT की पढ़ाई उन्हें उतनी चुनौती नहीं दे रही थी, जितनी उन्होंने उम्मीद की थी. IIT के दौरान उनकी सबसे ज्यादा दिलचस्पी दोस्तों के साथ राजनीति और दर्शन पर बहस करने में थी. वह लाइब्रेरी जाकर Bertrand Russell, George Orwell और Ayn Rand जैसे लेखकों की किताबें पढ़ते थे.

मजेदार बात यह है कि ये किताबें उनके इंजीनियरिंग के सिलेबस का हिस्सा नहीं थीं. लेकिन श्रीधर के मुताबिक, अलग-अलग विषयों को पढ़ने से उन्हें किसी भी समस्या को साफ तरीके से समझने और उसके बारे में सोचने की आदत मिली.

Princeton से PhD की, लेकिन बाद में उसे बताया अपनी असफलता

IIT Madras के बाद श्रीधर वेम्बू अमेरिका की Princeton University पहुंचे. वहां उन्होंने Electrical Engineering में PhD की. उस समय उनका सपना प्रोफेसर और रिसर्चर बनने का था. लेकिन PhD के दौरान धीरे-धीरे उनकी सोच बदलने लगी. उन्हें लगने लगा कि जिस तरह की रिसर्च वह कर रहे हैं, वह असली दुनिया की समस्याओं से काफी दूर है.

बाद में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह अपनी PhD को एक तरह की असफलता मानते हैं. यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, क्योंकि PhD हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. लेकिन श्रीधर का कहना था कि उन्होंने जरूरी रिसर्च पेपर लिखे, डिग्री पूरी की और सभी औपचारिकताएं भी पूरी कीं, फिर भी उन्हें महसूस हुआ कि यह रास्ता उनके लिए सही नहीं था.

इसके बाद उन्होंने प्रोफेसर बनने का रास्ता छोड़ दिया और तय किया कि अब उन्हें कुछ ऐसा करना है, जो असली दुनिया में काम आए.

Qualcomm की नौकरी ने बदल दिया नजरिया

PhD पूरी करने के बाद श्रीधर वेम्बू ने साल 1994 में Qualcomm जॉइन किया. यहां उनका अनुभव काफी अलग रहा. उन्होंने बताया था कि Qualcomm में सिर्फ दो साल काम करके उन्होंने जितना सीखा, उतना उन्हें पिछले कई सालों की पढ़ाई के दौरान नहीं मिला था. यहां उन्हें काफी अच्छे इंजीनियरों के साथ काम करने का मौका मिला.

लेकिन अच्छी नौकरी और अमेरिका में आरामदायक जिंदगी के बावजूद उनके मन में भारत को लेकर एक सवाल बना हुआ था. उन्हें हमेशा लगता था कि वह सिर्फ अपनी जिंदगी बेहतर बनाने के लिए नहीं आए हैं. वह भारत में कुछ बड़ा करना चाहते थे.

अच्छी नौकरी छोड़ी और भाई के साथ शुरू किया नया सफर

श्रीधर वेम्बू के भाई कुमार वेम्बू भी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम करते थे. दोनों भाई अक्सर इस बात पर चर्चा करते थे कि भारत में टेक्नोलॉजी के जरिए कुछ नया कैसे किया जा सकता है. साल 1995 के आसपास श्रीधर के मन में यह बात और मजबूत हो गई कि उन्हें अपना काम शुरू करना चाहिए. उन्होंने महसूस किया कि भारत की आर्थिक तरक्की के लिए सिर्फ सरकारी नौकरियां काफी नहीं हैं. बिजनेस और नई कंपनियां बनना भी जरूरी है.

यही सोच उन्हें नौकरी छोड़कर अपना बिजनेस शुरू करने की तरफ ले गई. साल 1996 में AdventNet की शुरुआत हुई. यही कंपनी बाद में Zoho Corporation के नाम से जानी गई. शुरुआती दौर में कंपनी ने नेटवर्क मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर पर काम किया.

Zoho नाम खरीदने के लिए भी पहले तैयार नहीं थे

आज Zoho एक बड़ा और मशहूर ब्रांड है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीधर वेम्बू शुरुआत में Zoho नाम खरीदने के लिए भी तैयार नहीं थे. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि Zoho नाम उनके साथी Raju Vegesna ने सुझाया था. साल 2003 में इस नाम का डोमेन खरीदने के लिए करीब 5,000 डॉलर खर्च करने पड़े थे. श्रीधर वेम्बू पहले इसके लिए तैयार नहीं थे. लेकिन बाद में यही नाम इतना मशहूर हुआ कि साल 2009 में कंपनी ने अपना नाम AdventNet से बदलकर Zoho Corporation कर लिया.

आज शायद ही कोई सोच सकता है कि जिस Zoho नाम को खरीदने को लेकर श्रीधर वेम्बू शुरुआत में हिचकिचा रहे थे, वही उनकी कंपनी की पहचान बन जाएगा.

करोड़ों की कंपनी के बाद भी शहर छोड़कर गांव में रहने चले गए

ज्यादातर बड़े बिजनेसमैन अपनी कंपनी को बड़े शहरों से चलाना पसंद करते हैं. लेकिन श्रीधर वेम्बू ने बिल्कुल उल्टा रास्ता चुना. साल 2019 में वह तमिलनाडु के तेनकासी के पास माथलमपराई गांव में रहने चले गए. आज भी वह ग्रामीण इलाकों में काम करने और वहां रोजगार पैदा करने की बात करते हैं. उनका मानना है कि भारत की सारी तरक्की सिर्फ बड़े शहरों में नहीं होनी चाहिए.

वह खेती में भी दिलचस्पी रखते हैं और कई बार गांव, पानी, खेती और ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों पर बात करते हैं. उनका यह फैसला शायद उनके बचपन से जुड़ा है, क्योंकि उन्होंने खुद गांव और शहर दोनों की जिंदगी को करीब से देखा था.

श्रीधर वेम्बू की कहानी क्या सिखाती है?

श्रीधर वेम्बू की कहानी सिर्फ यह नहीं बताती कि IIT और Princeton से पढ़कर कोई बड़ी कंपनी बनाई जा सकती है. उनकी कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है. वह बचपन में फर्श पर बैठकर पढ़े. स्कूल में होमवर्क नहीं मिलता था, इसलिए खाली समय में किताबें पढ़ते और क्रिकेट खेलते थे. 9 साल की उम्र में साइकिल से चुनाव प्रचार करते थे और 14 साल की उम्र में शिक्षकों से भारत की गरीबी को लेकर सवाल पूछते थे.

बाद में IIT पहुंचे, PhD की, अच्छी नौकरी की, लेकिन जब लगा कि रास्ता सही नहीं है तो उसे बदल दिया. शायद यही श्रीधर वेम्बू की सबसे बड़ी खासियत है. उन्होंने जिंदगी में किसी एक तय रास्ते को पकड़कर नहीं रखा. जब जरूरत लगी, सवाल पूछा. जब रास्ता सही नहीं लगा, उसे बदल दिया.

तमिल मीडियम स्कूल से पढ़ाई करने वाला एक बच्चा, जिसने कभी फर्श पर बैठकर पढ़ाई की थी, आज दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों को चुनौती देने वाली Zoho का निर्माण कर चुका है. लेकिन उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यह है कि इतनी बड़ी सफलता के बाद भी वह चमकदार शहरों की जिंदगी के बजाय गांव में रहकर भविष्य की टेक्नोलॉजी और ग्रामीण भारत, दोनों के बारे में सोचते हैं.

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