पति की मौत के बाद छह बच्चों की जिम्मेदारी और बुढ़ापे के सहारे के लिए वर्षों से फैमिली पेंशन की लड़ाई लड़ रही महिला को अब पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत की उम्मीद जगी है. दूसरी शादी की अनुमति के लिए पति की ओर से 1982 में दिए गए आवेदन को नजरअंदाज कर पेंशन का दावा खारिज करने पर कोर्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाई और पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया.
Bihar Family Pension पति के साथ बिताई जिंदगी, छह बच्चों की जिम्मेदारी और बुढ़ापे का सहारा बनने की उम्मीद… लेकिन पति की मौत के बाद यही सहारा एक महिला के लिए सरकारी दफ्तरों की लंबी लड़ाई में बदल गया. खुद को मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी बताने वाली इस महिला का फैमिली पेंशन का दावा वर्षों तक अटका रहा. अधिकारियों ने दूसरी शादी के लिए जरूरी अनुमति नहीं लिए जाने को आधार बनाकर उसका दावा खारिज कर दिया. आखिरकार मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए महिला के पक्ष में अहम टिप्पणी की और उसके पेंशन दावे पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया.
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की अदालत ने 25 अगस्त को मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मृत कर्मचारी और याचिकाकर्ता लंबे समय तक साथ रहे और एक-दूसरे की देखभाल करते रहे. पहली पत्नी की मृत्यु के बाद बुढ़ापे में महिला को ‘जीवनसाथी का दर्जा’ देने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए.
पति की मौत के बाद शुरू हुई पेंशन की जद्दोजहद
यह मामला 17 अप्रैल 2009 का है, जब जल संसाधन विभाग में क्लर्क के पद पर कार्यरत महिला के पति की मृत्यु हो गई. इसके बाद महिला ने खुद को उनकी दूसरी पत्नी बताते हुए फैमिली पेंशन की मांग की. महिला के अनुसार, उनके छह बच्चे हैं, जिनमें चार बेटियां भी शामिल हैं. लेकिन पेंशन का दावा आसानी से स्वीकार नहीं हुआ. अधिकारियों ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि कर्मचारी ने पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने से पहले सक्षम अधिकारी से आवश्यक अनुमति नहीं ली थी. महिला के लिए यह सिर्फ पेंशन का मामला नहीं था, बल्कि पति की मृत्यु के बाद बुढ़ापे में जीवन चलाने के सहारे का सवाल था.
कोर्ट के सामने आया 1982 का वह आवेदन
सुनवाई के दौरान एक अहम तथ्य सामने आया. रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज से पता चला कि मृत कर्मचारी ने 28 फरवरी 1982 को दूसरी शादी की अनुमति लेने के लिए विभाग को आवेदन दिया था. हाईकोर्ट ने पाया कि पेंशन का दावा खारिज करते समय अधिकारियों ने इस महत्वपूर्ण आवेदन पर विचार ही नहीं किया. अदालत के मुताबिक, यदि कर्मचारी ने नौकरी के दौरान ही दूसरी शादी की अनुमति के लिए आवेदन किया था, तो इस तथ्य और मामले की पूरी परिस्थितियों को नजरअंदाज करके सिर्फ अनुमति नहीं मिलने के आधार पर महिला का दावा खारिज करना उचित नहीं था.
पहली पत्नी ने भी नहीं जताई थी आपत्ति
मामले में एक और भावनात्मक पहलू सामने आया। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पहली पत्नी की कोई संतान नहीं थी और उसने दूसरी शादी पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी. रिकॉर्ड के मुताबिक, पहली पत्नी की दिसंबर 2009 में मृत्यु हो गई थी. वहीं, याचिकाकर्ता और मृत कर्मचारी लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे और उनके छह बच्चे हुए.अदालत ने इन परिस्थितियों को भी अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना.
‘जीवनसाथी का दर्जा’ देने से इनकार नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों को देखते हुए मृत कर्मचारी और याचिकाकर्ता साथ रहे, एक-दूसरे की देखभाल की और उनका पारिवारिक जीवन भी रहा. ऐसे में पहली पत्नी की मृत्यु के बाद बुढ़ापे में महिला को ‘जीवनसाथी का दर्जा’ देने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए. अदालत ने साफ किया कि महिला के पेंशन दावे पर विचार करते समय 1982 में दी गई अनुमति संबंधी अर्जी और पहली पत्नी की मृत्यु के बाद किए गए पेंशन दावे समेत सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखा जाना चाहिए.
2019 का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द
हाईकोर्ट ने मुजफ्फरपुर में बाढ़ नियंत्रण एवं जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता द्वारा 5 फरवरी 2019 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला का फैमिली पेंशन दावा खारिज किया गया था. अदालत ने कहा कि महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार नहीं किए जाने के कारण यह आदेश कायम नहीं रह सकता. अब मुख्य अभियंता को पूरे मामले और सही तथ्यों पर विचार करते हुए नया, तर्कपूर्ण आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया है.
17 अप्रैल 2009 से पेंशन का हक
अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता अपने पति की मृत्यु की तारीख यानी 17 अप्रैल 2009 से अपनी मृत्यु तक फैमिली पेंशन की हकदार थी. अब अधिकारियों को अदालत के निर्देश के अनुसार मामले पर दोबारा विचार करना होगा और कानून के मुताबिक पेंशन का भुगतान सुनिश्चित करना होगा.
